Kavita

भ्रष्टाचार

(ये कविता मैंने तब लिखा जब U.P के ग़ज़िआबाद शहर में एक इमारत अचानक गिर गई और जाँच में ये पता चला की वो इमारत ग़ैरकानूनी थी तब मैंने ये कविता लिखी)

किसी की जेब गरम कर , वो मौत बेचने लगते हैं।
हम भी किसी से कम हैं क्या ?
सस्ते के लालच में , मौत ख़रीदने लगते हैं।


जब भ्रष्टाचार का गिरने लगता है महल ,
तब वो कहते है., अब करेंगे रावण दहन ?


उनकी तो होती थी, सीधे यमराज से डील ,
अगर सरकार चाहती , तो उनके ताबूतों में भी अब तक ठुकी होती कील।


सरकार का आदेश आया , 7 दिन में गिरा दो भ्रष्टाचार का आशियाना ,
अरे उनको क्या पता , बनाने में लगता है कितना जमाना।


अगर यही फैसला लेना था, तो पहले ही ले लेते,
बिल्डिंग गिराने की जगह उसे बन्ने ही नहीं देते।


यही फैसला सही होता ,
नाही बिल्डिंग गिरती , नाही कोई रोता।